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कविता मंजरी

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धूप है मुश्किल धूप है कितनी तिलमिल तिलमिल। छाँह की आशा धूमिल धूमिल।। पायेंगे हम कैसे मंजिल। पायेंगे हम कैसे मंजिल। पाँव हमारे जलते कितने। राह के छाले छिलते कितने। अंगारों पर चलना मुश्किल। पायेंगे हम कैसे मंजिल। पायेंगे हम कैसे मंजिल। जीवन तो सागर की लहरें। पतवारें  पर कैसे तैरें साहिल को छूना है मुश्किल। पायेंगे हम कैसे मंजिल। पायेंगे हम कैसे मंजिल। लगता आलम बेगाना सा। खुद का चेहरा अंजाना सा। जब खुद से हो मिलना मुश्किल। पायेंगे हम कैसे मंजिल। पायेंगे हम कैसे मंजिल। कब से चलता आया राही। राहें भी  चाही अनचाही। जीवन धूप है जीना मुश्किल। पायेंगे हम कैसे मंजिल। पायेंगे हम कैसे मंजिल। सबको जब अपना जानेंगे। हम खुद को जब पहचानेंगें। आसां होगा रस्ता मुश्किल। होगी फिर कदमों पर  मंजिल। पायेंगे हम कैसे मंजिल। पायेंगे हम कैसे मंजिल। रचनाकार- राजेंद्र सिंह चौहान पता- वडोदरा,गुजरात  ईमेल- chauhanrs1969@gmail.com

कविता मंजरी

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आंदोलनजीवी उन्हें नफ़रत है क्रांति-व्रांति से चिढ़ है इंक़लाब के नारों  से जी हाँ  वही नारा जो लगाया था भगत सिंह ने वतन के वास्ते वही क्रांति जो लाना चाहते थे अशफ़ाक उल्ला ख़ाँ वे चाहते हैं भगत सिंह को बस पढ़ाया जाए किताबों में ही उनके विचारों के लक्षण न दिखे किसी एक भी छात्र के भीतर वे अपरिवर्तनवादी ग़ुलामपसंद डरते हैं परिवर्तन से आंदोलन वगैरह से  जो उठाएंगे आवाज़ सत्ता के खिलाफ़ वे नामज़द होंगे आंदोलनजीवी के रूप में।  रचनाकार - उज्ज्वल पाण्डेय छात्र व स्वतंत्र रचनाकार पता- धनबाद, झारखंड