कविता मंजरी

धूप है मुश्किल

धूप है कितनी तिलमिल तिलमिल।
छाँह की आशा धूमिल धूमिल।।
पायेंगे हम कैसे मंजिल। पायेंगे हम कैसे मंजिल।

पाँव हमारे जलते कितने।
राह के छाले छिलते कितने।
अंगारों पर चलना मुश्किल।
पायेंगे हम कैसे मंजिल। पायेंगे हम कैसे मंजिल।

जीवन तो सागर की लहरें।
पतवारें  पर कैसे तैरें
साहिल को छूना है मुश्किल।
पायेंगे हम कैसे मंजिल। पायेंगे हम कैसे मंजिल।

लगता आलम बेगाना सा।
खुद का चेहरा अंजाना सा।
जब खुद से हो मिलना मुश्किल।
पायेंगे हम कैसे मंजिल। पायेंगे हम कैसे मंजिल।

कब से चलता आया राही।
राहें भी  चाही अनचाही।
जीवन धूप है जीना मुश्किल।
पायेंगे हम कैसे मंजिल। पायेंगे हम कैसे मंजिल।

सबको जब अपना जानेंगे।
हम खुद को जब पहचानेंगें।
आसां होगा रस्ता मुश्किल।
होगी फिर कदमों पर  मंजिल।
पायेंगे हम कैसे मंजिल। पायेंगे हम कैसे मंजिल।



रचनाकार- राजेंद्र सिंह चौहान
पता- वडोदरा,गुजरात 
ईमेल- chauhanrs1969@gmail.com

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